लोक की न्याय व्यवस्था
श्रीहरि बोरिकर
न्याय एक व्यापक विचार है जो मानव जीवन के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित करता है।
प्राचीन काल से अब तक भारतीय न्याय व्यवस्था में बहुत से परिवर्तन आए हैं।
हर काल में न्याय व्यवस्था को लोक हित में उपयोगी बनाने का प्रयास किया जाता रहा है।
अगर हम वैदिक काल की बात करें तो उस समय राजा ही सर्वोच्च न्यायाधीश होता था लेकिन इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है की राजा एक तानाशाह की तरह था, राजा के परामर्शदाता होते थे, जिनसे परामर्श करने के बाद ही राजा फैसले सुनाता था।
उस समय कोई बहुत जटिल मुद्दे नही होते थे इसलिए बहुत विस्तृत न्यायपालिका नहीं थी, ज्यादातर मामले पशुधन की चोरी, संपत्ति के लेनदेन का विवाद, सामाजिक नियमों के उल्लंघन आदि के होते थे।
इसके पश्चात धर्मशास्त्रों में आने वाले काल में न्याय व्यवस्था के विकसित होने का प्रमाण मिलता है।
न्याय के लिए सभा गठित की जाने लगी।
सभा में 3 से 7 लोग होते थे और फैसला बहुमत के आधार पर ही लिया जाता था।
यह भी सुनिश्चित किया जाता था कि सभी सदस्य निष्पक्ष हों।
अपराधियों के लिए उनके अपराध के अनुसार दंड की भी व्यवस्था थी, जिनमें प्रमुख थे – अर्थदंड, कारागृह, अंग विच्छेद और मृत्युदंड।
इसके पश्चात मौर्य काल में न्याय व्यवस्था की संपूर्ण विवरण कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मिलता है।
इस काल में न्याय व्यवस्था को विभिन्न स्तरों पे संगठित करने का प्रयास किया गया।
गांव के विवादों पर विचार करने के लिए पंचायतें स्थापित की गईं।
नगरों में कुछ न्यायलय होते थे, जिनमें आसपास के दस गावों के विवादों का निर्णय किया जाता था।
इनके ऊपर 400 गांव वाले नगरों के न्यायालय थे।
इन सबके ऊपर स्थानीय अथवा जिले का न्यायलय था।
इनके ऊपर साम्राज्य के दो प्रदेशों के मध्य भाग में न्यायालय तथा उनके ऊपर पाटलिपुत्र के न्यायालय थे तथा सबसे ऊपर सम्राट का न्यायलय था, जिसमें न्यायकर्ताओ के साथ बैठ कर सम्राट समस्या पर विचार करता था।
निष्कर्ष के रूप में यह कह सकते हैं की उस समय न्याय व्यवस्था निष्पक्ष एवं विवेकाश्रित थीे तथा उसका पूर्ण रूप से विकास हो चुका था।
गुप्त काल में भी न्याय व्यस्था पहले की तुलना में अधिक विकसित हो गई थी।
यहां भी सम्राट सर्वोच्च न्यायाधीश होता था।
व्यापारियों की श्रेणियों के अलग न्यायालय व अपने कानून होते थे जो अपने सदस्यों के विवादों का निपटारा करते थे।
गावों में ग्राम पंचायत न्याय करती थी।
इसके अलावा अलग अलग श्रेणियों के न्यायालय भी थे।
इसके बाद भारत में मुस्लिम आक्रमणकारियों के आने के बाद न्याय व्यवस्था इस्लामिक धर्म के अनुसार परिवर्तित हो गई।
इसमें बहुत सी दुर्व्यवस्थाएं थीं।
शरिया कानून को जबरदस्ती थोपा जाने लगा। लोगों पे अत्याचार होने लगे। व्यापारियों पर अनावश्यक कर थोपे जाने लगे।
इसी के विपरीत मराठा राज्य का शासन तंत्र अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करने के लिए निरंतर कार्य कर रहा था।
शिवाजी ने सुचारू रूप से व्यवस्था चलाने के लिए आठ मंत्रियों का एक परिषद् गठित किया जिसे अष्टप्रधान की संज्ञा दी गई।
ये शिवाजी के सचिव के रूप में तैनात थे और उनका कार्य अपने- अपने विभागों के कामों का पर्यवेक्षण करके, उससे संबंधित सलाह देना था।
ये आठ मंत्री – पेशवा (प्रधानमंत्री), अमात्य (वित्त मंत्री), वाकयानवीस (राजनीतिक सचिव), शुरूनवीस (अधीक्षक), दाबीर (विदेश सचिव), सर-ए-नौबत (मुख्य सेना नायक), पंडित राव एवं दानाध्यक्ष (धर्म प्रमुख) और न्यायाधीश थे।
ये सभी अपने कार्य द्वारा राज्य में न्याय व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने में सहायता करते थे।
इसके बाद भारत में ब्रिटिश सरकार की हुकूमत आने के बाद न्याय व्यवस्था उनके अनुसार परिवर्तित हो गई।
शुरुआत में कानून और न्याय का प्रशासन गैर कानूनी और गैर पेशेवर अंग्रेजो के हाथों में था जो आपस में विवादों का निपटारा कर लेते थे।
इसके बाद ब्रिटिश संसद द्वारा पारित 1773 के विनियमन अधिनियम के तहत कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय का गठन हुआ।
इसमें पेशेवर अंग्रेजी न्यायाधीश थे जो कानून और न्यायिक प्रक्रिया में पारंगत थे।
1861 के उच्च न्यायालय अधिनियम के तहत कई शहरों में उच्च न्यायालयों का गठन किया गया।
ब्रिटिश शासन ने हमारी न्यायायिक व्यवस्था में बहुत से बदलाव किए, कुछ सकारात्मक भी थे लेकिन कुछ ऐसे भी परिवर्तन थे जो आज भी हमारी न्याय व्यवस्था में घुसपैठ किए हुए हैं, जैसे कि उनकी अंग्रेजी भाषा ।
स्वतंत्रता के बाद भारत में न्याय व्यवस्था में फिर कुछ परिवर्तन हुए, जो कि लोक कल्याण को ध्यान में रखते हुए बनाए गए।
न्यायपालिका की संरचना कई स्तर पर हुई, जैसे सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय और जिला न्यायालय।
लोक हित में ये सभी कार्य करते हैं और अगर कोई निचली अदालत के फैसले से संतुष्ट नहीं है तो उसे उच्च स्तर के न्यायालय में जाने का पूरा अधिकार प्राप्त है।
इन न्यायालयों का काम सिर्फ कानूनी मामले सुलझाना ही नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना भी है।
इस तरह से आज की न्याय व्यवस्था पूरी तरह से लोक हित में है।