लोकमंथन

देश-काल-स्तिथि

18-20 फरवरी 2022

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हमारे बारे में

भारत में संचित ज्ञान को साझा करने, संभाषण तथा बोद्धिक विमर्ष करने की अति प्राचीन परम्परा रही है I गत कुछ शाताब्दियों में यह देश राजनीतिक तथा सामाजिक दुर्बलताओं के कारण संकीर्णता की स्थिति में रहा है I इसका प्रभाव न केवल इसके सामाजिक एवं धार्मिक मूल्यों पर अपितु उसकी ज्ञान सम्पदा तथा आर्थिक समृधि पर भी विपरीत रूप से पड़ा I तथापि हमारी राष्ट्रीयता का अधिष्ठान हमारी धार्मिक, राजनीतिक अथवा प्रशासकीय तंत्र मे न होकर हमारी अक्षुण्ण संस्कृति मे निहित है जो इस की अपार जनसमूह को सहस्त्राब्दियों से एकता के सूत्र में बांधे हुए है I वर्तमान समय में भारतीय विचारकों तथा नेतृत्व ने अपने आपको इस आत्मविश्वास से परिपूर्ण महान राष्ट्र के लिए समर्पित किया है I

लोकमंथन “राष्ट्र सर्वोपरि” की भावना से परिपूर्ण विचारकों एवं कर्मशीलों का लोकमंच है I जिसने वर्ष 2016 व 2018 में सार्वजनिक चिंतन में महत्वपूर्ण प्रभाव डाला I समकालीन मुद्दों को साझा करने, बौद्धिक विमर्श तथा आख्यान के लिए सबसे बड़ा मंच बनकर उभरा है जो न केवल देश बल्कि दुनिया को भी प्रभावित कर रहा है I इस राष्ट्रीय विमर्श का मंत्र परानुभूति और जागरूकता के आधार पर उभरते राष्ट्रवाद, अपेक्षाओ, सामाजिक न्याय तथा समता के आधार पर विकास को माध्यम बनाते हुए सामाजिक गतिशीलता के समस्त प्रयासों का संगम है I

कला, साहित्य, मीडिया और सिनेमा किसी भी देश के सम्बन्ध में उसके समाज की मनःस्थिति को सृजित करने में महती भूमिका का निर्वहन करता है I किसी भी देश की शैक्षिक तथा आर्थिक समृधि एवं उसके बढ़ते वैश्विक पदचिन्ह समाज की मनःस्थिति को प्रदर्शित करते हैं I नए एवं युवा चिंतकों एवं कर्मशीलों ने नवीन भारत को गहरे दर्शन और राष्ट्रीयता के बोध से गढ़ा है I लोकमंथन 2022 का उद्देश्य राष्ट्र के इन राजदूतों की सामूहिक प्रज्ञा को एकीकृत कर अपने अतीत की गौरवशाली परंपराओं और भारत के उज्ज्वल भविष्य के विकास के आधार पर अपने विशिष्ट राष्ट्रीय चरित्र को प्रदर्शित करना है I

लोकमंथन का पहला संस्करण 2016 में भोपाल में आयोजित किया गया जिस का मुख्य विषय देश-काल-स्तिथि पर केंद्रित था। संगोष्ठी में अभूतपूर्व भागीदारी रही, देश के सभी प्रांतो के विचारक एवं कर्मशीलो ने इस राष्ट्र आहुति में योगदान दिया। लोकमंथन 2016 ने राष्ट्रीयता के विमर्ष को 'औपनिवेशिकता से भारतीय मानस की मुक्ति', 'राष्ट्रिय अस्मिता एवं अन्य पहचानों का समायोजन' एवं 'राष्ट्र निर्माण में कला, संस्कृति, इतिहास और मिडिया की भूमिका ' के माध्यम से एक नए आयाम पर पहुँचाया। मात्र दो महीनो के अंतराल में पाँच प्रकाशन लोकमंथन के माध्यम से किये गए।

लोकमंथन 2018 (भारत बोध : जन गण मन ) ने मुख्य रूप से कला से लेकर पर्यावरण के विषयों को एक बहुस्तरीय वैचारिक मंच प्रदान किया। चार दिवसीय संगोष्ठी में समाज के सभी वर्गों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। भारत के माननीय उपराष्ट्रपति, श्री एम वेंकैया नायडू और तत्कालीन माननीय लोकसभा अध्यक्ष, श्रीमती सुमित्रा महाजन ने कार्यक्रम की शोभा बड़ाई। विभिन्न प्रकाशनों और जमीनी स्तर पर परिवर्तन लाने वाले कर्मशीलों की सतत भागीदारी से लोकमंथन का संदेश न केवल बुद्धिजीवियों के बीच बल्कि भारत के आम जनमानस के बीच भी प्रसारित हुआ ।

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